परिचय-
महिला सशक्तिकरण आज केवल एक नारा नहीं, बल्कि समाज की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। लेकिन क्या वास्तव में महिलाएँ आत्मनिर्भर होने की राह पर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ पा रही हैं? इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए Social Reforms and Research Organisation (SRRO) ने हाल ही में एक विस्तृत सर्वे किया। इस सर्वे में 84 लोगों ने अपनी राय साझा की, जिसके परिणाम चौंकाने वाले और गहरी आत्म-चिंतन की मांग करने वाले हैं।
आइए, सर्वे के आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि आखिर वे कौन सी सामाजिक बाधाएं हैं जो आज भी महिलाओं के कदम रोक रही हैं।
1. रूढ़िवादी सोच: सबसे बड़ी दीवार (47.6%)
सर्वे के सबसे प्रमुख नतीजे बताते हैं कि 47.6% लोगों का मानना है कि ‘रूढ़िवादी सोच’ (Orthodox Mindset) महिलाओं की आत्मनिर्भरता में सबसे बड़ी बाधा है। आज भी समाज के एक बड़े हिस्से का मानना है कि “महिलाओं को केवल घर ही संभालना चाहिए।”
इसके परिणामस्वरूप, भले ही महिलाएँ शिक्षित हो जाएं, लेकिन उनके करियर के फैसलों पर परिवार और समाज का दबाव बना रहता है। यह सोच न केवल उनकी प्रतिभा को सीमित करती है, बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी तोड़ती है। जब तक समाज “घर की जिम्मेदारी सिर्फ महिला की है” वाली मानसिकता से बाहर नहीं निकलेगा, तब तक पूर्ण स्वावलंबन एक सपना ही रहेगा।
2. घरेलू जिम्मेदारियों का अत्यधिक बोझ (25%)
सर्वे में दूसरी सबसे बड़ी बाधा ‘घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ’ बताई गई है, जिसे 25% लोगों ने चुना। एक कामकाजी महिला से यह अपेक्षा की जाती है कि वह दफ्तर के काम के साथ-साथ घर के चूल्हे-चौके और बच्चों की परवरिश की शत-प्रतिशत जिम्मेदारी भी निभाए।
इसी कारण, कई प्रतिभाशाली महिलाएँ “डबल बर्डन” (Double Burden) के कारण बीच में ही अपना करियर छोड़ देती हैं। आत्मनिर्भरता की राह में यह बोझ एक ऐसी अदृश्य जंजीर है, जो उन्हें खुलकर उड़ने नहीं देती। कार्यक्षेत्र और घर के बीच संतुलन बिठाने की यह जद्दोजहद उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालती है।
3. उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण की कमी (16.7%)
16.7% उत्तरदाताओं का मानना है कि शिक्षा और सही कौशल (Skill Training) का अभाव महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने से रोकता है। विशेष रूप से, ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लड़कों की शिक्षा पर लड़कियों के मुकाबले ज्यादा खर्च किया जाता है।
इसके अलावा, बदलते डिजिटल युग में तकनीकी कौशल की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। जब तक महिलाओं को आधुनिक बाजार की जरूरतों के हिसाब से ट्रेनिंग नहीं मिलेगी, तब तक वे उच्च पदों और बेहतर आय वाले अवसरों से वंचित रहेंगी। SRRO जैसे संगठनों का मानना है कि कौशल विकास ही वह चाबी है, जो आत्मनिर्भरता के द्वार खोल सकती है।
4. कार्यस्थल पर असुरक्षा का डर (10.7%)
हालांकि यह आंकड़ा 10.7% है, लेकिन कार्यस्थल पर असुरक्षा का डर एक गंभीर चिंता का विषय है। घर से बाहर निकलते समय सुरक्षा की चिंता, कार्यस्थल पर होने वाला भेदभाव या उत्पीड़न महिलाओं के मनोबल को प्रभावित करता है।
अतः, यदि हम वास्तव में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं, तो हमें एक सुरक्षित और समावेशी कार्य वातावरण (Safe Work Environment) सुनिश्चित करना होगा। जब तक कोई महिला खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेगी, वह अपनी पूरी क्षमता से योगदान नहीं दे पाएगी।
SRRO का दृष्टिकोण: बदलाव की राह क्या है?
Social Reforms and Research Organisation (SRRO) हमेशा से सामाजिक बदलाव और महिला सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध रहा है। हमारे इस सर्वे से यह स्पष्ट है कि बाधाएँ केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे तक जमी हुई ‘सामाजिक’ हैं।
हम क्या कर सकते हैं?
मानसिकता में बदलाव: परिवारों को यह समझना होगा कि घर और समाज की प्रगति में महिला और पुरुष दोनों की समान भागीदारी जरूरी है।
समान अवसर: घरेलू कामों में हाथ बँटाने की संस्कृति विकसित करनी होगी ताकि महिलाएँ अपने करियर पर ध्यान दे सकें।
स्किल डेवलपमेंट: महिलाओं को डिजिटल साक्षरता और प्रोफेशनल स्किल्स से लैस करना अनिवार्य है।
सामुदायिक सहयोग: समाज के हर वर्ग को महिलाओं के लिए एक सुरक्षित और सहायक वातावरण बनाने की जिम्मेदारी लेनी होगी।
निष्कर्ष-
आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल पैसे कमाना नहीं है, बल्कि अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की आजादी है। SRRO के इस सर्वे के आंकड़े हमें आइना दिखाते हैं कि तकनीकी रूप से आगे बढ़ने के बावजूद हम सोच के स्तर पर अभी भी रूढ़ियों में जकड़े हुए हैं।
अंततः, महिला सशक्तिकरण की राह घर से ही शुरू होती है। जब हम अपनी बेटियों, बहनों और पत्नियों को वह सम्मान और अवसर देंगे जिसकी वे हकदार हैं, तभी एक समृद्ध समाज की कल्पना साकार होगी।
Written By- Shivangi Pandey
“SRRO works as an implementation partner for CSR and social impact projects”


